रमन सिंह के जीत के उपर भरोसा के संग छत्तीसगढ़ के साहित्यकार के निष्पक्ष विचार – बीजेपी की रणनीति और भविष्य

आसन्न चुनाव के बाद बीजेपी का गणित निश्चित रूप से बदलने वाला है और केन्द्रीय नेतृत्व के लिए एक समावेशी विकल्प की तलाश होना तय है

हालांकि न मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति हूँ न कोई राजनीतिक विष्लेषक। लेकिन जैसा मैं सोचता हूँ उसे व्यक्त करने से अपने को रोक भी नहीं पाता। वर्तमान में देश पाँच राज्यों के विधान सभा चुनाव को देख रहा है। इस चुनाव में केन्द्रीय सत्ता ने चुनाव आयोग में दबाव बनाकर मनमाफिक चुनाव कार्यक्रम घोषित करवाने में भले सफलता पा ली हो। लेकिन चुनाव केबाद निश्चित रूप से यही केन्द्रीय सत्ता कमजोर होने जा रही है। पाँच राज्यों में सबसे पहले मतदान की तारीख छत्तीसगढ़ में रखने के पीछे कौन सी सबसे सड़ी वजह है इस पर कोई चर्चा भले न हुई हो लेकिन इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण प्रदेश के मुखिया की बेदाग लोकप्रियता और प्रदेश का चहुंमुखी विकास है। यहाँ की मतदाताओं को कोई दुविधा नहीं है कि वे क्यों सरकार को चौथा मौका देना चाहते हैं। 20 तारीख को मतदान के अंतिम चरण के बाद बीजेपी बाकी प्रदेशों में यही हवा बनाएंगे कि छत्तीसगढ़ की मतदाताओं ने बीजेपी को चौथी बार सरकार बनाने के लिए मतदान किया है। अतः आप यहाँ भी बीजेपी को ही वोट दें।

राजनीतिक दलों में एक बड़ी बुराई होती है कि वे किसी को महत्वकांक्षा प्रकट करने से रोकता है। जबकि इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिसने अपनी महत्वाकांक्षा को प्रकट किया वे आज पीएम हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि डॉ. रमन सिंह को केन्द्रीय राजनीति का ज्यादा अनुभव नहीं है। लेकिन क्या वर्तमान पीएम को केन्द्रीय राजनीति का अनुभव था? वे तो कभी लोकसभा का चुनाव तक नहीं लड़े थे। जबकि डॉ. रमन सिंह केंद्र में राज्यमंत्री तक रह चुके हैं।

इस बीच केन्द्रीय नेतृत्व भले ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को महत्व न दे। लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद कोई भी छत्तीसगढ़के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अहमियत को नकारने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। डॉ. रमन सिंह ने भी हार-जीत की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की घोषणा कर समझदारी का परिचय दिया है। उन्होंने कहा है कि ये चुनाव केंद्र के कामकाज के आधार पर नहीं लड़े जा रहे हैं और हार-जीत की पूरी जिम्मेदारी उनकी होगी। अभी बीजेपी में कोई सर्वाधिक कुशल नेता हैं तो वो डॉ. रमन सिंह हैं। उनमें बाजपेयी जी के समान समावेशी गुण है जो सबको साथ लेकर चलने में अपने अहम को सामने नहीं लाते। कुछ लोग गरीबों को सस्ते राशन और अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं के वितरण के लिए मुफ्तखोरी की आदत डालने का आरोप भले लगाते रहें पर इससे गरीबों का भला होने और भूख से मुक्ति से इंकार नहीं कर सकते।
मोदी की लोकप्रियता में उतार के बाद केन्द्रीय नेतृत्व में विकल्प की बात उठती है तो कुछ लोग नितिन गड़करी का नाम लेते हैं। वे क्यों भूल जाते हैं कि एक नाम और है जो बीजेपी में सर्वमान्य हो सकता है। राजनीतिक दलों में एक बड़ी बुराई होती है कि वे किसी को महत्वकांक्षा प्रकट करने से रोकता है। जबकि इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिसने अपनी महत्वाकांक्षा को प्रकट किया वे आज पीएम हैं।
कुछ लोग कह सकते हैं कि डॉ. रमन सिंह को केन्द्रीय राजनीति का ज्यादा अनुभव नहीं है। लेकिन क्या वर्तमान पीएम को केन्द्रीय राजनीति का अनुभव था? वे तो कभी लोकसभा का चुनाव तक नहीं लड़े थे। जबकि डॉ. रमन सिंह केंद्र में राज्यमंत्री तक रह चुके हैं।
आसन्न चुनाव के बाद बीजेपी का गणित निश्चित रूप से बदलने वाला है और केन्द्रीय नेतृत्व के लिए एक समावेशी विकल्प की तलाश होना तय है। आर एस एस के लिए मोदी अनुकूल चेहरा नहीं रहे ऐसा समय-समय पर ज्ञात होते रहता है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की जनता क्या ऐसा नहीं चाहेगी कि छत्तीसगढ़ ही देश को नेतृत्व प्रदान करे? क्या यह छत्तीसगढ़ के लिए कम गौरव की बात होगी?
दिनेश चौहान
सेवानिवृत्त शिक्षक और साहित्यकार

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