इतवारी: नवा बछर -खाए पीए उछर !!

सरी दुनिया 1 जनवरी के नवा बछर मनाथे। विविधता अउ विचार ले भरे भारत म 1 जनवरी के संगे -संग आने -आने बेरा म नवा बछर मनाए जाथे।
तइहा समे बेरा ल नापे -जोखे -गिने के कोनो अधार नई रिहिसे। पूर्वज मन चँदा-सुरूज ल ठिहा मानके दिन ल नापय -गिनय। जेकर अनुसार चैत ले बछर शुरू होके फागुन म जाके सिरावय-थिरावय। अब ग्रेगोरियन कलेण्डर आगे हवय जेला सरी दुनिया मानथे अउ ओकरे दिन -तिथि अनुसार चलथे। एकर शुरूआत 1 जनवरी ले होथे। इही दिन दुनिया नवा बछर मनाथे। भारत किसनहा देश हरे। इहाँ के हरेक परब अउ तिहार किसानी ले जुड़े हवय। छत्तीसगढ़ म बैसाख महीना के अंजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) के तीसरइया दिन (अक्ती ) ल किसानी तिहार के रूप म मनाथे। येला अक्षय तृतीया कहिथे। ये दिन किसानी ले जुरे जम्मो बूूता माने फसल के बोनी ले लेके काम -बूता करइया मन के नियुक्ति तक के बोहनी करे जाथे। खरीफ फसल माने धान बोवई के बोहनी ल ‘मूठ धरना’ अउ नियुक्ति होवइया कमइया-बनिहार ल ‘पौनी-पसारी’ कहे जाथे।
जिनगी के शुरूआत के प्रतीक पुतरा-पुतरा के बिहाव रचाए जाथे। प्रकृति माने जम्मो रूख-राई ल पानी देहे जाथे अउ भींजे चना दार अउ चाऊँर संग फूल -पान अर्पित करके सकभर दान-दक्षिणा करे जाथे। जम्मो भारत म बैसाख महीना म ही नवा बछर मनाए जाथे चाहे वोह जुड़शीतल, पोहेला बोइशाख, बोहाग बिहू, विशु या पुत्थंडु काबर नई होवय। पहिली सियान मन कइसन -कइसन किसम ले कोन कोन बेरा म अपन नवा बछर मनावय, देखथन
नवसंवत्सर-
चैत महीना के अंजोरी एकम (शुक्ल प्रतिपदा) ल नवसंवत्सर कहे जाथे। असल म नवा बछर के आरूग आगमन इही दिन होथे। भारत म पंचाग के शुरूआत राजा विक्रमादित्य के समे म होइस। येकर गिनती के अधार चंदा-सुरूज हवय अउ इही पंचाग के बेरा ले सप्ताह के सातो दिन अउ 12 महीना के बछर माने जाथे, जेला हम विक्रम संवत के नाम ले जानथन। पुराण के अनुसार इही दिन ब्रम्हा ह सृष्टि के रचना करे रिहिसे। आयुर्वेद के अनुसार ये दिन लीम (नीम) के पान-फूल अउ गुर (गुड़) के सेवन करे ले मनखे सब रोग -राई ले दूरिहा रहिथे। ये करू-मीठ ह जिनगी के सुख-दुख, दिन -रात, जीत-हार, लाभ-हानि, प्रेम-द्वेष के तको चिन्हा हरे।
बैसाखी परब-
बैसाखी सिक्ख मन के नवा बछर हरे। खालसा संवत के अनुसार खालसा पंचाग बैसाख एकम 1756 विक्रम संवत माने 30 मार्च 1699 के शुरू होय रिहिसे। बैसाखी ल सौर्य मास के पहिला दिन माने जाथे। कहे जाथे कि इही दिन धरती म गंगा अवतरे रिहिसे तेकर सेति ये दिन गंगा स्नान के बड़ महात्तम हे। बैसाखी के दिन सुरूज मेष राशि म संक्रमण करथे तेकर सेति येला मेष संक्रांति या विषुवत संक्रांति तको कहे जाथे। बैसाखी पंजाब प्रांत के मुखिया तिहार हरे। रबी फसल कटई के बेरा म किसान उछाह ले भरके ये तिहार ल मनाथे। ये दिन किसान उपजे -पाके फसल बर ईश्वर ल धन्यवाद देथे। येला धन्यवाद तिहार तको कहि सकथन। आवत पौनी बैसाखी परब के एक ठो परम्परा होथे जेमा गँहू लुए (काटे) बर लोगन एक जगा सकेलाथे-जुरियाथे। संझा बेरा आगी तीरन सकेलाके आदमी जात मन भाँगड़ा अउ माइलोगन मन गिद्धा नाचथे। ये तिहार ल अमेरिका, कनाडा अउ इंग्लैंड म तको मनाए जाथे।.

उगादि/युगादि- तेलगू नवा बछर
उगादी/उगादि/युगादि ल दक्षिण भारत माने आंध्रप्रदेश, कर्नाटक अउ तेलंगाना म नवा बछर के रूप म मनाए जाथे। येहा हिन्दी के चैत महीना (चैत नवरात्रि) के पहिली दिन अउ अंग्रेजी के मार्च-अप्रैल के बीच म परथे।.

गुड़ी पड़वा-
चैत महीना के पहिली दिन माने चैत नवरात्रि के पहिली दिन ये तिहार ल मराठी अउ कोंकनी मन नवा बछर के रूप मनाथे। ये दिन गुड़ी ल घर के दुवारी म सजाये जाथे। गुड़ी के मायने ‘विजय पताका’ होथे।

पुत्थांडु- तमिल नवा बछर –
येला पुथुवरूषम या तमिल नवा बछर घलो कहिथे। इही ल दक्षिण तमिलनाडू के रहइया मन चिंतारीय विशु कहिथे। ये तमिल तारीख ल तमिल महीना चिधिराई के पहिला दिन के रूप म लन्नीसरोल हिंदू पंचाग के सौर चक्र के संग स्थापित करे गे रिहिसे। ये बेरा म तमिल मन एक दूसर ल ‘पुट्टू वतुत्काका’ कहिके एक दूसर ल बधई देथे। जेकर मायने ‘नवा बछर के बधई’ होथे। येला तमिलनाडू अउ पांडिचेरी के बाहिर श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, माॅरीशस के रहइया प्रवासी तमिल मन तको मनाथे। ये दिन कच्चा आम, गुड़ अउ नीम के फूल ले तिहार के खास डिश तियार करे जाथे।
बोहाग बिहू- असमी नवा बछर
बोहाग बिहू असम के सबले मुखिया तिहार हरे। येला रोंगाली बिहू तको कहिथे। ये ह सात दिन के होथे। बिहू म बिहू नाच अउ बिहू लोक गीत के मेल हवय। येला अप्रैल महीना के बीचो-बीच माने बैसाख महीना म विशुव संक्रांति (मेष संक्राति) स्थानीय भाखा म बोहग(भास्कर पंचाग) के रूप म मनाए जाथे। येकर छोड़ इहाँ अक्टूबर म कोगाली बिहू अउ जनवरी म माघ बिहू या भोगाली बिहू तको मनाए के परम्परा हावय, जऊन ह फसल के कटई अउ ओकर ले उपजे उछाह के चिनहा हरे। तेकर सेति येला फसल तिहार घलो कहिथे। ये पारंपरिक नवा बछर ह तीनो बिहू ल मिलाके एक महीना के हो जथे।
बंगाली नवा बछर-
बंगाली नवाबछर अप्रैल महीना के बीच पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, अउ असम (बराक घाटी) म मनाए जाथे। बैसाख महीना के पहिली दिन ‘पोइला बोईशाख’ नाम ले जाने जाथे। बोइशाख बंगाली पंचाग के पहिला महीना होथे। बंगाली पंचाग हिन्दू वैदिक सौर मास ऊपर आधारित हे। नवा बछर म बंगाली मन ‘शुभो नोवोकोर्शो’ कहिके एक दूसर ल जोहार-भेट करथे जेकर मायने ‘नवा बछर मुबारक’ होथे। ये बेरा बंगाल म उछाह मंगल शोभायात्रा के आयोजन करे जाथे। 2016 म यूनेस्को ह ललित कला संकाय, ढाका विश्वविद्यालय कोति ले आयोजित ये उत्सव ल मानवता के सांस्कृतिक विरासत घोषित करे हावय।
गुजराती नवा बछर-
गुजराती नवाबछर ‘बेस्तु वर्ष’ देवारी के दूसरइया दिन मनाए जाथे। माने जाथे कि भगवान श्री कृष्ण ह ब्रज म होवत घनघोर बरसा ल थाम्हे बर गोवर्धन पूजा करे रिहिसे। गोर्वधन पूजा के दिन ले गुजराती नवा बछर के शुरुआत माने जाथे।

विषु/विषुक्कणी- केरल/मलयालम नवा बछर
विषु केरल नवाबछर के दिन हरे। विषुक्कणी वो झाँकी दर्शन ल कहे जाथे जेकर दर्शन विषु के दिन बड़े बिहिनिया ले सबले पहिली करे जाथे। येला मलयालम महीना मेदम के पहिलावत तिथि के मनाए जाथे। केरल म विषु उत्सव के दिन धान के बोआई शुरू होथे। काँसा के बर्तन म चाऊँर, नवा कपड़ा, कच्चा आमा, पान के पत्ता, सुपारी, कटहर, आइना, धनबहेरा (अमलतास) के फूल आदि सजाके ओकर तीरन लंबा दीया बारके रखे जाथे जेला विषुक्कणी कहिथे।

नवरेह- कश्मीरी नवा बछर
नवरेह नव चंद्रवर्ष के रूप म हिन्दू पंचाग के चैत अंजोरी पाख माने नवरात्र के पहिली दिन मनाए जाथे। नवरेह संस्कृत के नववर्ष ले बने हे जेकर मायने नवा बछर होथे। ये दिन कश्मीरी पंडित मन अपन देवी शारिका ल सुपरित करथे। माने जाथे कि देवी शारिका, शारिका परबता (हरि परबता) म निवास करथे जिहाँ सुरूज के पहिली किरण चक्रेश्वरी म परथे तेकर सेति ये दिन ल शुभ माने जाथे। अइसे कहे जाथे कि कश्मीरी हिन्दू मन के सप्तर्षि युग 5079 बछर पहिली नवरेह के दिन शुरू होय रिहिसे। नवरेह के बिहिनिया लोगन सबले पहिली चाऊँर ले भरे बर्तन के दर्शन करथे येला पोठ अउ बाढ़त भविष्य के प्रतीक माने जाथे। प्रथा के अनुसार तिहार के पहिली दिन बड़े असन थारी म चाऊँर, पंचाग, फूल, जड़ी-बूटी, कलम-स्याही, आइना, सोन -चाँदी के सिक्का, नून, गँहू जइसन प्रसाद ले भरे जाथे जेकर बिहिनिया ले जम्मो एके संघरा दर्शन करथे। चाऊँर अउ सिक्का जिनगी के दैनिक रोटी अउ धन के, कलम, कागज अउ सियाही सीखे के कला अउ ओकर खोज के सुरता देवाथे। दरपन ह पूर्व व्यापीकरण के प्रतिनिधित्व करथे त उहेंचे करू जड़ी-बूटी ह जिनगी के करू-कासा अउ खट-मीठ अनभो के सुरता देवाथे।
बिखोरी उत्सव-
नवा बछर के रूप उत्तराखण्ड म बिखोरी महोत्सव मनाए जाथे। जेकर अंतर्गत लोगन पवित्र नदिया म डुबकी लगाथे। उहेंचे प्रतीकात्मक राक्षस मन ल पखरा म मारे के तको परम्परा हावय।
बिहार के जुड़शीतल-
बिहार, झारखण्ड अउ नेपाल के मिथिला क्षेत्र म मैथिली नवा बछर के रूप म मनाए जाथे। इही ल जुड़शीतल अउ सतुआनी तको कहिथे। येह तिरहुत या मैथिली पंचाग के पहिला दिन होथे। ये तिहार ल मिथिला अउ नेपाल के मैथिली समुदाय के लोगन मन रबी फसल कटई के खुशी म मनाथे। ये दिन परिवार म सत्तू आटा जऊन ह आनी -बानी के अनाज के मिंझरा पिसान के बनथे ओकर जेवन कराए जाथे। गुड़ अउ सत्तु के संगे-संग मौसमी फल अउ जल ले भराए घड़ा के दान तको करे जाथे।
महा विशुव संक्रांति-
महाविषुव संक्रांति उड़िया नवा बछर हरे जऊन उड़ीसा म मनाए जाथे। येमा उड़िया लोक नृत्य अउ शास्त्रीय नृत्य होथे जेमा शिव ले जुरे छाऊ नृत्य तको संघरे हावय।
हिजरी-इस्लामिक नवा बछर-
इस्लामिक बछर मुहर्रम के पहिली दिन ले शुरू होथे। हिजरी एक चंद्र अधारित पंचाग हरे। इस्लामिक धार्मिक तिहार मनाए बर हिजरी पंचाग के उपयोग करे जाथे।
जमरोदी नवरोज- पारसी नवा बछर
पारसी नवा बछर जमरोदी नवरोज अंगे्रजी पंचाग के अगस्त महीना म मनाए जाथे। फारस के राजा जमशेद ह पारसी पंचाग के शुरूआत करे रिहिसे। पारसी समुदाय बर नवा बछर नवरोज आस्था अउ उछाह के ंसंगम हरे। ये उछाह सहींच म ब्रम्हाण्ड म जम्मो जिनिस के नवीनीकरण ल फरिहाके बताथे।
बौद्ध बैसाख –
अइसेनेहे एतिहासिक तिहार भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्वी एशिया अउ दक्षिण पूर्व एशिया म बुद्ध के जनमदिवस के रूप म मनाए जाथे जऊन ‘वेसाक’ कहाथे। इहीच ल वैसाखी पूर्णिमा, वैसाखा या वेसाखा के नाम ले तको जाने जाथे।
नवा बिहान
नवा बछर बीते बछर के सुख-दुख, घाम-छईंहा, करू-मीठ, अपन -बिरान, हितुवा -बइरी, गुन-अवगुन, चिन्हार-अनचिन्हार मन ले मिले-उछरे नवा भल-अनभल, अनभो -अनुमान ले भेंट कराथे। माने नवा बछर जुन्ना के जम्मो खाए पीए ल उछरथे, जेकर ले अवइया बेरा के काँटा -खूँटी, झाड़-झँखाड़, खोचका-डबरा, करू-कासा ल छाँट-निमार, चिन-पहिचान के अपन नवा रद्दा बना सकन। अपन धरम-करम, नीत-नियााव, सेवा-संस्कार के प्रति चेत कर सकन।
इही चेत-हियाव, कर्तब-बोध अउ नवा आस-बिस्वास के अँचरा धरके चले म ही जिनगानी सँवर सकथे। भविष्य सुग्घर जगमगा सकथे। नवा बछर के परब मनाए भर ले कुछु भल हाथ आ जतिस त कोनो बाते नई रहितिस। सुरूज तो रोजे उथे -बूड़थे। रात-दिन बोहावत धार कस सरलग आते-जावत रहिथे। बछर बीतते रहिथे। खा-पीके डकार मारत बेरा पहाते रहिथे।
नवाबछर मनाए के सार्थकता अउ सुघरई तभे हे जब नवा सोच, नवा मनोबल अउ नवा परन के संग नवा रद्दा चुन उही म आगू बढ़न नइते सबे नवा बछर खा पीके उछर बरोबर हो जही। नवाबछर तुँहर जिनगी म उमंग, उछाह अउ उज्जर भविष्य लेके आवय अउ तुँहला साज-सँवार, सहिराए के लइक बनावय अइसन आसरा के संग गाड़ा -गाड़ा बधई

जय जोहार !!
धर्मेन्द्र निर्मल

लउछरहा..