इतवारी: दिन कइसन आगे संगी !!

बात जादा जुनियाए नइहे। दूए दिन पहिली के हरय। काम से एक ठो आफिस के चक्कर लगावत रहेंव। उह बीच एक झन मोर आगू ले गुजरिस। छरहरा देंह, ऊँचपूर, सूट-बूट ले दुमटाम। मोर नजर के लबेदा परे ले ओकर चाल के आमा ‘लद्द ले’ मोर अंतस म गिरगे। ओकर लकधक, लदफद चाल-ढाल बतावत रिहिस हे कि वो कइसन चाल के हे।
थोकन बेर म मैं अपन काम निपटावत वो आफिस म बइठे रहेंव। कति ले घूमत-फिरत वो धूमकेतु कस उहेंचे आ धमकिस। आते साथ मेडम ल कहिस- ‘मेडम जी नमस्ते ! का बात हे आज आप अबड़ व्यस्त हौ।’
‘ये तो हमर रोज के बूता हरे, हम इही म मस्त हवन, व्यस्त हमर ले पस्त रहिथे।’
सुन्दर सिरिफ बाते भर के नहीं, जात, घात अउ मात म तको सुन्दर रिहिस हे। वो समझगे- जऊन व्यस्त हा, व्यस्त हौं कहिथे उही सबले जादा अस्त-व्यस्त रहिथे। वो ह चाव के मोल -भाव करे बिना भाव के एक दांव मारिस-
‘नहीं ! आप मुस्कुरावत नइहौ।’
जब कोनो सुन्दर सुग्घर ढंग ले सुलहारे त कोनो सुन्दरिया कइसे सुनसुनाए रहय भला। येला कहिथे अक्कल से धक्कल मारे म बेअक्कल तको चप्पल नइ मारय। मेडम अभीन तक अपन मति के छरियावत धीरज ल बाँधे के बूता करत रिहिस हे। ओकर कोंवर बानी के पानी परे ले मेडम के धीर के भक्का लाडू छरियागे।
मनखे उही मुँह ले पान खाथे उही मुँह ले पनही। वो सुन्दर लड़का जेला आजकल के भाखा म ‘स्मार्ट’ कहिथे, पान खाए वाले बानी के सदुपयोग करे रिहिस हे। वो सुन्दर लड़का के नाम तो नइ पता फेर चलव ओकर नाम सुन्दर रख देथन। अब आगू कोति ओला सुन्दर कहिबोन।
अइसन मनखे पनवाड़ी बानी के सुन्दर, सुग्घर, सदुपयोगी ठऊर -ठिकाना अउ ठिहा ल ठऊँका जानथे। पनवाड़ी बानी ले मुँह तो लाल होबेच करथे, संगे-संग गाल के चमक अउ पनही के धमक घलो बने रहिथे। जिनगी म ठसन ठनठनावत ठसाठस भरे रहिथे।
मेडम अपन बूता के बोझा ल पटक डरिस। मुड़ के मोटरी ल छोर-उघारके बताए लगिस- ‘देख न ! का करबे। ये है, वो हे, अमका हे, ढमका हे।’
ओकर मोटरा म फलाना-ढेकाना, छकना-छकाना, चखना-चखाना, आनी-बानी के बूता। किसम -किसम के लफड़ा के दफड़ा बजाए लगिस मेडम ह। आखिर म कहे – ‘ये मस्का पालिस, हाव-भाव अउ चाव-दौंव ल आप बताव। का काम हे?’
मोर मन बदबदाइस- ‘अरे मॉम ! इहाँ कोन निश्काम ? तमाम तामझाम, झिमझाम सब सकाम हे।’
सुन्दर अपन सुन्दर चाल म आ गे। पाम्प्लेट देखाए लगिस।
‘ये सब मोला मत देखा, मगज खराब होथे, काम के गोठ गोठिया’ -मेडम मुड़ी खजुवाइस -‘मै ये सब देखके का करहूँ ?’
‘का मेडम आप जानके तको अनजान बनथौ’
मोर नजर पाम्प्लेट ऊपर परगे, मैं अपन फुसियाहा हुसियारी ल बकर डरेवं -‘पेन्टिंग प्रतियोगिता!’
सुन्दर झट चटकारिस- ‘हाँ ! देखो साहब समझगे? हम चेरिटी वाले अन मेडम, अइसे नहीं, हम पत्रकार तको हन।’
‘पत्रकार हौ, ठीक हे, त मैं का कर सकथौं ?’- मेडम कहिस।
मैं भकमुड़वा कस अपन मुड़ ल दे परेवैं- ‘ये पेन्टिंग प्रतियोगिता होथे का?’
सुन्दर के चाल ल ढाल मिलगे। वो ढाल थाम्हे ढलान म ढुलगत ताल मारत कहिस -‘देख ! साहब अब्‍बड़ समझदार हे, उहू हाँ म हाँ मिलावत हे। कइसे साहब ?’
मैं कहेंव – ‘देख यार ! मैं फोकटइहा हुँकारू के हमेरी नइ झाड़ौं। तैं कइसे कहि दिए कि मैं तोर गोठ म हुँकारू हॉकत हौं। जब तक जम्मो बात ल फरी-फरा नइ बताबे तब तक मैं कइसे जानहूँ कि तैं का कहना चाहत हस | मोर गोठ के भाप म तैं अपन फरा ल झन उसन।’
ओतका म सुन्दर अपन चाल ल फरी बताए बर गोठ ल फरियाए के उदीम करे लगगे। फोकलू मोबाइल ल चालू कर लिस। एक झिन मेडम के वीडियो चलाए लगिस- ‘देख, येला देख। जानथस कोन हरे ?’ चिटिक रूक के ओला दुरूग के अबड़ बड़का अधिकारी के नाम लेवत कहिस- ‘ये फलानीन मेडम हरे।’ अउ मोला देखाए लगिस।
मैं कहेवैं- ‘ये मत देखा मोला। अइसन अधिकारी मन ल रोज देखथन, रोजे मिलथन, पेपर दिखा।’
पेपर म कुछुच नइ रिहिस हे। वो जुच्छा पेन्टिंग प्रतियोगिता के पाम्प्लेट रिहिस हे। मोर सुरता के कबर म ओइसनेहे देखे -गुजरे, सुने -जाने जबर -जबर घटना के भूत मन खदर-छानी बनाके बसेरा करे हावय। उन उदुपहा जागगे। अकर-जकर ल देखत हबर -हबर निकले लगिन। मैं भकभकाके उछरे लगेंव- ‘अरे यार ! ये बिलकुल गलत हे भाई, अहसे नइ होना चाही। अइसन हमर इहाँ नइ होवय।’
‘हम ओइसन नइ हैं भइया। हम पत्रकार हैं, चैरिटी वाले हैं।’
‘मैं अक्सर देखथौं, कतकोन बाहिरी मन अइसनेहे सब ल बेवकूप बनाथे। कभू गाय के दू पूछी, पाँच पाँव या .. कभू तीन ठिन कान म दूकान खोल लेथे – देखव ये नंदी, ये कामधेनु त कभू अउ कुछ। मनखे तो घलो छैअँगुरिया, बटरेंगवा, तीरपट, दैइतला जनमथे, कभू पूजा करे हस ओकर?’
‘भइया ! भइया !! हम ओइसन नइ करन।’ हाथ जोरके ऊपर फेंकत -देखत इसारा करिस- ‘हम ओकर ले डरथन- भोलेनाथ ले !’
‘तोर भोलेनाथ मोर माथ ले छँ हाथ ऊपर गै भाई। मैं सब समझ गेवें।’
वो बिन सकपकाए चटाक ले कहिथे- ‘अरे भइया, हमू छत्तीसगढ़िया हरौं, इहेंचे के पैदाइस ये।’
मैं कहेवें – ‘देख भाई ! पैदाइस भर ले कुछ नइ होवय। छत्तीसगढ़ म पैदा नइ होके तको मनखे छत्तीसगढ़िया हो सकथे। बात इहाँ क्षेत्रीयता – माने छत्तीसगढ़िया अउ बाहिरी, संकीर्णता -माने दुराव अउ छुपाव, साम्प्रदायिकता – माने जात -पात के भेदभाव के नइ हे। बात छत्तीसगढ़ के संस्कृति, अस्मिता अउ संस्कार के हे। स्वाभिमान के हे। छत्तीसगढ़िया आंव कहिके इहाँ के भावना संग खिलवाड़ करे के हे।’
वोकर चैरिटी के चोलिया चेंदरा रहय। चर्रर के चिरागे। कहे लगिस- ‘सही बात सर जी, विलकुल सही बात।’ .
अइसेनेहे जिनगी के कतको पतझर देखत -झेलत मोर अंतस के जम्मो पाना -पतऊव्वा पींवरागे हवय।
उपरहा म ये बंडोरा ले बाँचे -खुचे पाना मन झरे लगिस – ‘ये सब घाम -छाँव, जाड़- उमस, हवा-पानी म दिन भर खैंटके, ईमानदारी अउ लगन से कमाथे। अपन पेट काट-काट के भविष्‍य बर कुछु जोरे के उदीम करथे, उन्कर भावना ले तुम अइसे खिलवाड़ करथौ। का इही छत्तीसगढिया के पहिचान हरे? का इही मानवता ये?’
वो कट्ट खाए कठवा कस खड़े रहिगे। बोकबाय सोचत- ‘सब खदर-बदर, छीछी-लेदर होगे यार।’
फसल के पैदावार माटी अउ आब-हवा ऊपर निर्भर करथे। कहूँ-कहूँ माटी बॉझ होथे। बने बीजहा तको ओकर बर बदरा पर जथे। उहां कतको बने खातू-पानी डार, जब उपजही त बेंवारस बन-कचराच उपजही, बने फसल होबे नइ करय। कहूँ के भूंइया ले वीर सपूत अवतरथे, कोनों भूंईया गाय -गरूवा कस सीधवा जनमथे, त कोनो-कोनो माटी म बइमाने पैदा होथे।
वो ईमानदार छत्तीसगढ़िया सुन्दर के श्‍यामसुन्दर सखा बइमानी हैं ओकर संग ल नइ छोड़ सकिस। वोह मुड़ ल नवाके धीरे कुन मेडम ल कहिस- “ठीक हे मेडम ! दू सौ नहीं ते सौ -पचास ही दे दौ।’
मेडम अपन कलला काटे बर पत्लू झर्रावत पचास रूपिया ल धरा दिस- “ले तोर मुख ल टार ये मेर ले, मोला बहुत काम हे।’
कर कोनो बंचक के बेंवारस लड़का बइमानी अउ बंचकई ल छोड़ दिही त तो ओकर जिनगी जऊँहर हो जही।
बने सुग्घर खातू- पानी अउ सेवा -जतन ले पोसे-पाले खेती ओतका चिक्कन, हरियर, सुग्घर अउ पोठ नइ होवय जतका अदर-कचर म उपजे वेंवारस बन कचरा मन होथे अउ लहलहाथे।
वो सुन्दर अपन बइमानी अउ नीचता के दाहरा म एक पाँव अउ उतरगे। अपन गोठ -बात अउ कागज-पत्तर ल घरियावत-धरियावत कहिथे- ‘येमा दस्कत्त कर देवव न मेडम।’
मेडम कहिस-‘अब फोकट कचर-कचर झन कर, रेंग ये मेर ले।’
मैं विचारा विचार के बैंड़ोरा म उड़ाए लगेवैं- ‘वा भई ! ये होथे नीचतई के जिद अउ सिधई के हद !’

जय जोहार !!
धर्मेन्द्र निर्मल

लउछरहा..