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ये पार राहुल ओ पार राहुल बीच म बघेलं !!

आया के धरहा अउ चोक्खा कैंची-चाकू ले काट-बोंगके जनमे चीरहा जींसधारी लइका मन के धियान कोन कोति गिस होही तेला नइ बता सकवँ। फेर गँवइहा दाई के मीठ मया भरे गारी, अथक मेहनत अउ सार्थक साधक हाथ ले अवतरे धोती युगीन मनखे मन के मइन्ता म इहीच आइस होही।

ये पार नदी वो पार नदी, बीच म ठुड़गा रूख रे !!
सोन चिरइया गार देहे, हेरे के बेरा दुख रे !!

हहो जी ! आप बिल्कुल सही पकड़े हैं। हम तभो धोती युगीन रहे हवन अउ आजो धोती युगीन हवन। हमार कहे के मतलब उहीच रिहिस हे। शहर अपन करम किस्मत म काँही राहय, गाँव अभीन ले अपन मनखेपन ल चिमोट -पोटारके धरे-बचाके राखे हवय। आज भी ककरो दुख-सुख म ओतके अपनत्व अउ ममत्व भरे सत्यनिष्ठा अउ ईमानदारी ले संघरथे जतका हम नान्हेपन ले देखत -सुनत आवत हन। ये बात अलग हे कि समे के सुर म सुर मिलावत रेंगत-चलत-दऊँड़त भाव-भजन अउ मेल-मिलाप के रूप, रंग अउ ढंग बेसुर, निठुर अउ चिटिक चुरपुर होगे हे।

भूपेष बघेल उही धोतीयुगीन संस्कार ले सरोकार रखइया ठेठ छत्तिसगढ़िया गँवइहा अउ किसनहा मयारू कका हरे। कका मन मयारूच होथे। एक पइत ददा ह कुछु बात बर लइका ल गुसिया-खिसियाके भगा-चेचकार देथे फेर कका के मया, दुलार अउ बात-बेवहार ह लइका के जम्मो अनभरोस अउ अलकर बेरा म बगल म खड़े रहिके पोठ, रोंठ अउ ठाहिल संबल देथे।

पिरहीद गाँव जिला जांजगीर -चाँपा के रहइया राहुल साहू बोरवेल म गिरगे रिहिस हावय। नान्हे जीव, 60 फीट गड्ढा, 105 घण्टा के बेरा। बिचारा ! नान्हेपन ले न बोल सकय न सुन सकय त काला बतावय। ओकर पीरा उही जानय अउ वो ऊपर वाले जानय जऊन 60 फीट खाल्हे म ओकर संग कइसे निभिस-निभाइस।

60 फीट खाल्हे म कोनो किसम ले उतरके बचाव दल तको अपन फर्ज निभाइस। देष अउ समाज दूनो ल गज्जब गरब होथे अइसन अग्निवीर मन ऊपर। उन्कर वीरता, साहस अउ करम ल सत-सत प्रणाम ! जऊन मन अपन परान के परवाह करे बिना कड़क, कठोर अउ कठिन अग्निपथ म चलके मनखे होए के करम करिन, फरज निभाइन अउ मनखे-मनखे के मन, हिरदे अउ अंतस म परम आत्मा के विराट स्वरूप के दर्षन कराइन। बड़का बूता बर बड़का संकल्प चाही। राजा कहूँ संकल्प कर लेवय त कतको साँकुर ठऊर अउ अल्प काल होवय, विकल्प के कमी नइ परय।

डाक्टर अउ राजा ल धरती म भगवान के रूप माने जाथे। ओकरे सेति राजा के एक नाम जगतपाल तको परे हवय। आँसू सुख के होवय चाहे दुख के होवय, आँसू के बयान बड़ धाँसू होथे संगवारी। राहुल साहू के महतारी रोवत, सिसकत अउ कलपत कहिस कि तहीं हमर भगवान अस। मनखे ल भगवान सिध करे बर येकर ले बड़े अउ का आसिरवाद चाही। महतारी के ममता म वो क्षमता होथे कि मनखे ल भगवान के समता म खड़ा कर देथे। पूत कपूत भले हो जाय फेर माता कभू कुमाता नइ हो सकय।

धधकत अंगरा कस कठिन परिस्थिति ल अग्निपथ कहिथे। उही म सत संकल्प ले सही विकल्प चुनके वीरता, धीरता अउ सफलता के झंडा गड़इया मनखे अग्निवीर कहाथे। दानवीर, करमवीर, धरमवीर के नाम तो गजब सुने रहेन। अग्निवीर के नाम अउ रूप के दर्षन समय, देष अउ समाज ल आज होइस। कतकोन बयानवीर मन कहिथे कि आज मनखे के आँखी ले पानी सुखागे हे, मानवता मरगे हे अउ भल नँदागे हे। आँखी के पानी सुखाए ले आँखी के रोषनी कम हो जथे। जानकार मन ओकरे सेति आँखी ल ठंडा पानी म घेरी पइत धोए के सुलाह देवत रोषनी संग सुलह करे के समझाइस देवत रहिथे। दुनिया म सियानसिंह, बुधराम अउ हुसियारचंद मन कमी नइ हे। उन अपन खुरहा-पाती दिमाग के मिलवट अउ फोेकटइहा खाद ले एकर उपजाऊपन ल दुगुन-तीगुन आगर जादा बढ़ा लेथे। दुनिया के आगू सुदर्षन, प्रदर्षन अउ दूरदर्षन चाहत अउ लालच धरे गोड़धोवन म आँखी धोए के उदीम कर डारथे।

सदाचारी अउ सद्व्यवहारी सत्पुरूष दुनियाई दिखावा के छलावा ले कोसो दुरिहा रहिथे। भूपेष कका उही किसम के विषम विचारी हरे जेकर समकक्ष दूसर कभू न होइस न होवय। जउन बेरा राहुल साहू बोरवेल म गिरे रिहिस उही पइत राहुल बबा ल विषम परिस्थिति घेरे रिहिस। बघेल कका के ऊँचहा ठिहा म खड़े राहुल गाँधी के संग खड़े होके आसरा दे बर हकर-हकर दिल्ली जवई अउ हँफरत लहुटके लकर-धकर गहिरी म गिरे राहुल साहू ल हालचाल जाने बर अस्पताल दऊँड़ई गजबे संहरई के गोठ हरे। येकर ले इही पता चलथे कि ओकर हिरदे के आसरा अउ मया के पसरा कतेक बिसाल हवय। इही बताथे कि वो जीवटता, मानवता अउ कर्मठता के सऊँहत त्रिमूर्ति हरे, जऊन हँफर-हँफरके पुन कमाए के धुन म बिधुन रिहिस। दिल्ली दऊँड़ मान के पान चबा लिस त पिरहीद पहुँच मरजाद के लाज रख लिस। वोकर ये कर्तव्य भावना सच्चा जनसेउक के श्रेष्ठता, घनिष्ठता अउ वरिष्ठता ल सिद्ध, समृद्ध अउ प्रसिद्ध करथे। यत्र-तत्र-सर्वत्र पवित्र चरित्र के इत्र बगराथे। मनखे उमर अउ पद ले बड़े नइ होवय, मन ले बड़े होथे। जे मन ले बड़े होथे उही महान होथे अउ मान के अधिकारी होथे।
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक।
पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।

जग म बालहठ, तिरियाहठ अउ राजहठ तीन हठ होथे। बालहठ मुस्कान लेके, तिरियाहठ सम्मान लेके अउ राजहठ परान लेके छोड़थे। ये हिसाब म हठ काकरो होवय षठ के परिचायक होथे। फेर हमर कका हठ अउ षठ के उरभट रद्दा ले हटके अपन अलग मठ तियार करथे। एक मठाधीष बर सबो बरोबर होथे, न कोनो छोटका न कोनो बड़का। मनखे -मनखे एक समान। जीयव अउ जीयन दौ के इही भावना अउ संकल्प ले चोरोबोरो भींजे, रंगे अउ रचे संत ही मठाधीष ले जगदीष तक के सुग्घर अउ जबर सफर ल सहज, सरल अउ सफलतापूर्वक तय कर पाथे।

बघेल जी के ये संकल्प अउ विकल्प के जतका बड़ई करे जाय, कमतीच हे।

जय जोहार !
धर्मेन्द्र निर्मल

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